प्रशांत भूषण ने अधिकारियों, बैंकरों, जजों के सेवानिवृति के बाद कॉर्पोरेट से जुड़ने पर सवाल उठाया

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के पूर्व प्रमुखों, बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के प्रमुखों से लेकर जजों तक के सेवानिवृत्ति के बाद रिलायंस जैसे कॉर्पोरेट से जुड़ने पर सवाल उठाया है।

शुक्रवार (18 सितंबर) को सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या रिटायरमेंट के बाद ऐसी नौकरियों पर रोक लगनी चाहिए जिनसे पद पर रहते हुए हितों का टकराव पैदा होता हो।प्रशांत भूषण ने लिखा कि सीवीसी, सीएजी के पूर्व प्रमुख, बैंकों और पीएसयू के प्रमुख और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी रिटायरमेंट के बाद रिलायंस से जुड़े हैं—वही कंपनी जिसके लिए उन्हें अपने कार्यकाल के दौरान रेगुलेटर के तौर पर काम करना पड़ा था।

इस लिस्ट में प्रशांत भूषण ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की पूर्व चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य, पूर्व सीवीसी केवी चौधरी, बीपीसीएल के पूर्व चेयरमैन सार्थक बेहुरिया, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के पूर्व चेयरमैन संजीव सिंह और जीएआईएल के पूर्व डायरेक्टर जनरल प्रभात सिंह के नाम लिखे हैं।

इनके अलावा, जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन डी. सेनगुप्ता, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष एवं महाप्रबंधक केके पुरवार, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस कृष्णा मुरारी, पूर्व सीएजी राजीव महर्षि, वित्त सचिव आरएस गुजराल, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के डिप्टी गवर्नर एमके जैन और आईसीआईसीआई बैंक के पूर्व प्रमुख केवी कामथ भी रिलायंस से जुड़ने वाले अधिकारियों में शामिल हैं।

प्रशांत भूषण की पोस्ट के बाद, कॉर्पोरेट और ब्यूरोक्रेसी के बीच इस गठजोड़ पर बहस तेज हो गई है। आलोचकों का मानना है कि जब किसी अधिकारी, रेगुलेटर या जज को पता होता है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घरानों में से किसी एक में करोड़ों डॉलर का पैकेज या बोर्ड में कोई प्रतिष्ठित पद मिल सकता है, तो पद पर रहते हुए उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

ये अधिकारी हर मामले में फैसले लेने वाले होते हैं, चाहे वह स्पेक्ट्रम आवंटन हो, पर्यावरण संबंधी मंजूरी हो, टैक्स में छूट हो, लोन रीस्ट्रक्चरिंग हो या कानूनी विवाद हों। इसलिए, प्रशासनिक पारदर्शिता और जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए, रिटायरमेंट के बाद प्राइवेट कंपनियों में शामिल होने पर सख्त ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ या पूरी तरह रोक लगाने की मांग की जा रही है।

(जनचौक ब्यूरो)

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